मेरा कितना ख़्याल रक्खा है
उसने खुद को सभाल रक्खा है
दर्द से दोस्ती है बरसों की
दर्द सीने में पाल रक्खा है
मेरी दरियादिली ने ही मुझको
गहरे दरिया मेम डाल रक्खा है
उसने मुश्किल का हल बताने में
और मुश्किल में डाल रक्खा है
घर की बढ़ती ज़रुरतों ने उसे
घर से बाहर निकाल रक्खा है


June 2nd, 2010 at 11:36 am
Apki ye ghazal mehfilo me farmaiesh ki jati hai aksar.mubarak ho
August 30th, 2010 at 3:15 am
kya baat he mujhe bahut achchhi lagi ye kavita or dinesh ji or kumar vishvash ji mere fevrit kavi he