किसी से बात कोई आजकल नहीं होती
इसीलिए तो मुकम्म्ल ग़ज़ल नहीं होती
ग़ज़ल सी लगती है लेकिन ग़ज़ल नहीं होती
सभी की ज़िंदगी खिलता कँवल नहीं होती
तमाम उम्र तजुर्बात ये सिखाते हैं
कोई भी राह शुरु में सहल नहीं होती
मुझे भी उससे कोई बात अब नहीं करनी
अब उसकी ओर से जब तक पहल नहीं होती
वो जब भी हँसती है कितनी उदास लगती है
वो इक पहेली है जो मुझसे हल नहीं होती


June 23rd, 2009 at 3:17 am
ultimate………………….
February 18th, 2010 at 4:05 am
bahut khoosoorat…. kamaal hai…. laajawab.
May 29th, 2010 at 6:13 am
amazing !!!bahut hee khubsurat aur ……shabdveheen hun…!!tumhare geet ,sirf akele chalne ka man hai….gem !!!!
saadar
June 2nd, 2010 at 11:44 am
Your this ghazal is ready to record.