• मिलते हैं पर मिलके बात नहीं करते
    करते हैं तो दिल से बात नहीं करते

    पहले वक़्त नहीं था बच्चों की खातिर
    वक़्त मिला अब बच्चे बात नहीं करते

    ख़ुद से ही बतियाता रहता है अक्सर
    उसके अपने उससे बात नहीं करते

    उसने कितनी बातें की थीं अपनों से
    अब कहता है अपने बात नहीं करते

    पैसा पैसा पैसा करने वाले सुन
    इंसानों से पैसे बात नहीं करते

  • अपनी आवाज ही सुनूँ कब तक
    इतनी तन्हाई में रहूँ कब तक

    इन्तिहा हर किसी की होती है
    दर्द कहता है मैं उठूँ कब तक

    मेरी तकदीर लिखनेवाले, मैं
    ख्वाब टूटे हुए चुनूँ कब तक

    कोई जैसे कि अजनबी से मिले
    खुद से ऐसे भला मिलूँ कब तक

    जिसको आना है क्यूँ नहीं आता
    अपनी पलकें खुली रखूँ कब तक

  • चुप्पियाँ तोड़ना जरुरी है
    लब पे कोई सदा जरुरी है

    आइना हमसे आज कहने लगा
    खुद से भी राब्ता जरुरी है

    हमसे कोई खफ़ा-सा लगता है
    कुछ न कुछ तो हुआ जरुरी है

    जिंदगी ही हसीन हो जाए
    इक तुम्हारी रजा जरुरी है

    अब दवा का असर नहीं होगा
    अब किसी की दुआ जरुरी है

  • गहरी प्यास को जैसे मीठा जल देते तुम बाबूजी
    जीवन को सारे प्रश्नों के हल देते तुम बाबूजी

    सबके हिस्से शीतल छाया, अपने हिस्से धूप कड़ी
    गर होते तो काहे ऐसे पल देते तुम बाबूजी

    माँ तो जैसे – तैसे रुखे सूखे टूकड़े दे पायी
    गर होते तो टाफ़ी, बिस्कुट, फल देते तुम बाबूजी

    अपने बच्चों को अच्छा – सा वर्तमान तो देते ही
    जीवन भर को एक सुरक्षित कल देते तुम बाबूजी

    काश तरक्की देखी होती अपने नन्हें-मुन्नों की
    फिर चाहे तो इस दुनिया से चल देते तुम बाबूजी

  • ओस की बूँदें पड़ीं तो पत्तियाँ खुश हो गई
    फूल कुछ ऐसे खिले कि टहनियाँ खुश हो गई

    बेखुदी में दिन तेरे आने के यूँही गिन लिये
    अक पल को यूँ लगा कि उँगलियाँ खुश हो गई

    देखकर उसकी उदासी, अनमनी थीं वादियाँ
    खिलखिलाकर वो हँसा तो वादियाँ खुश हो गई

    आँसुओं में भीगे मेरे शब्द जैसे हँस पड़े
    तुमने होठों से छुआ तो चिटठियाँ खुश हो गई

    साहिलों पर दूर तक चुपचाप बिखरी थीं जहाँ
    छोटे बच्चों ने चुनी तो सीपीयाँ खुश हो गई

  • जिनके हिस्से अपनी माँ की लोरियाँ आती नहीं
    उनके सपनों में भी परियाँ, तितलियाँ आती नहीं

    नींव पर जो स्वार्थ की चुनते गये, बुनते गये
    ऐसे रिश्तों में कभी नजदीकियाँ आती नहीं

    मेरी इन आँखों के आँसू जानते हैं बात ये
    मेरी पलकों तक कीसी की उँगलियाँ आती नहीं

    एक मुददत से मुझे तुम याद करते हो कहाँ
    एक मुददत से मुझे अब हिचकियाँ आती नहीं

    कौन – सा है घर जहाँ पर लोरियाँ गूँजी न हों
    कौन – सा है घर जहाँ से सिसकियाँ आती नहीं

  • आनी-जानी दुनिया है
    ये कब किसकी दुनिया है

    दुनिया में सब लोगों की
    अपनी –अपनी दुनिया है

    सबसे अच्छा अपना घर
    यूँ तो सारी दुनिया है

    उसको ये अहसास कहाँ
    उससे मेरी दुनिया है

    अब उस पर क्या हक़ मेरा
    उसकी अपनी दुनिया है

  • मेरा कितना ख़्याल रक्खा है
    उसने खुद को सभाल रक्खा है

    दर्द से दोस्ती है बरसों की
    दर्द सीने में पाल रक्खा है

    मेरी दरियादिली ने ही मुझको
    गहरे दरिया मेम डाल रक्खा है

    उसने मुश्किल का हल बताने में
    और मुश्किल में डाल रक्खा है

    घर की बढ़ती ज़रुरतों ने उसे
    घर से बाहर निकाल रक्खा है

  • लगने लगी हैं दिल को यूँ अच्छी उदासियाँ
    चलती हैं साथ हौसला देती उदासियाँ

    इक रोज़ ज़िन्दगी से यूँ बोली उदासियाँ
    हर आदमी के साथ हैं उसकी उदासियाँ

    ये कौन दे गया हमें इतनी उदासियाँ
    हर इक ख़ुशी के साथ हैं लिपटी उदासियाँ

    कुछ से ख़ुदा ने दूर ही रक्खी उदासियाँ
    कुछ को ख़ुदा ने सौंप दीं कितनी उदासियाँ

    वो शख़्स जो उदासियाँ को जानता न था
    उसको सभी ने सौंप दीं अपनी उदासियाँ

  • इक मुसलसल सफ़र में रहता हूँ
    ये मैं किसके असर में रहता हूँ

    मुझको ये बेखुदी कहाँ लाई
    अब मै सबकी नज़र में रहता हूँ

    जब भी सोचूँ मैं कुछ तुझे लेकर
    एक अन्जाने डर में रहता हूँ

    देवता होता तो निकल पाता
    आदमी हूँ, भँवर में रहता हूँ

    घर की दुनिया से कुछ नही अच्छा
    घर से बाहर भी घर में रहता हूँ

« Previous Entries