• Listen this geet Listen

    गीत तुम्हारे तुमको सौंप सकूँ शायद
    बस्ती-बस्ती गीत लिए फिरता हूँ मैं

    प्यार की उन नन्हीं-नन्हीं सी राहों ने
    पर्वत जैसी ऊँचाई दे डाली है
    लेकिन सच्चाई ये किसको बतलाऊँ
    शिखरों पर आकर मन कितना ख़ाली है

    खुद से हार गया पर सब की नज़रों में
    हर बाज़ी में जीत लिए फिरता हूँ मैं

    तुम्हें देखकर सूरज रोज़ निकलता था
    तुमको पाकर कलियाँ भी मुस्कुराती थीं
    तुमसे मिलकर फूल महकते उपवन के
    तुमको छूकर गीत हवाएँ गाती थीं

    बरसों बीत तुमने छुआ था पर अब तक
    साँसों में संगीत लिए फिरत हूँ मैं

    उजियारों की चाहत में जो पाए हैं
    अँधकार हैं, मेरे मीत सँभालो तुम
    स्म्बन्धों के बोझ नहीं उठते मुझसे
    आकर अब तो अपने गीत सँभालो तुम

    जो भी दर्द भी मिला दुनिया में रिश्तों से
    गीतों में, मनमीत! लिए फिरता हूँ मैं

    कब तक , आखिर कब तक इक बंजारे-सा
    बतलाओ तो मुझको जीवन जीना है
    कब तक आख़िर कब तक यूँ हँसकर निश-दिन
    अमरित की चाहत में यह विष पीना है

    चेहरे पर चेहरे वालों की दुनिया में
    दिल में सच्ची प्रीत लिए फिरता हूँ मैं

  • Listen this geet listen

    रिश्ते कई बार बेड़ी बन जाते हैं
    प्रशनचिह्न बन राहों में तन जाते हैं
    ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
    कुछ दिन सिर्फ़ अकेले चलने का मन है

    तनहा चलना रास नहीं आता लेकिन
    कभी-कभी तनहा भी चलना अच्छा है
    जिसको शीतल छाँव जलाती हो पल-पल
    कड़ी धुप में उसका जलना अच्छा है

    अपना बनकर जब उजियारे छ्लते हों
    अँधियारों का हाथ थामना अच्छा है
    रोज़-रोज़ शबनम भी अगर दग़ा दे तो
    अंगारों का हाथ थामना अच्छा है

    क़दम-क़दम पर शर्त लगे जिस रिश्ते में
    तो वह रिश्ता भी केवल इक बन्धन है
    ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
    कुछ दिन सिर्फ़ अकेले चलने का मन है

    दुनिया में जिसने भी आँखें खोली हैं
    साथ जन्म के उसकी एक कहानी है
    उसकी आँखों में जीवन के सपने हैं
    आँसू हैं,आँसू के साथ रवानी है

    अब ये उसकी क़िस्मत कितने आँसू हैं
    और उसकी आँखों में कितने सपने हैं
    बेगाने तो आख़िर बेगाने ठहरे
    उसके अपनों मे भी कितने अपने हैं

    अपनों और बेगानों से भी तो हटकर
    जीकर देखा जाए कि कैसा जीवन है
    ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
    कुछ दिन सिर्फ़ अकेले चलने का मन है

    अपना बोझा खुद ही ढोना पड़त है
    सच है रिश्ते अक्सर साथ नहीं देते
    पाँवों को छाले तो हँसकर देते है
    पर हँसती-गाती सौग़ात नहीं देते

    जिसने भी सुलझाना चाहा रिश्तों को
    रिश्ते उससे उतना रोज़ उलझते हैं
    जिसने भी परवाह नहीं की रिश्तों की
    रिश्ते उससे अपने आप सुलझते हैं

    कभी ज़िन्दगी अगर मिली तो कह देंगे
    तुझको सुलझाना भी कितनी उलझन है
    ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
    कुछ दिन सिर्फ़ अकेले चलने का मन है

  • Listen this geet Listen

    साथ सब न चल सकेंगे,ये तो हम भी जानते हैं
    लोग रास्ते में रुकेंगे, ये तो हम भी जानते हैं
    दूसरों के आँसू अपनी, आँख से जो भी बहाये
    वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जए
    साथ सब ना चल सकेंगे…

    दूसरों को जानते हैं, खुद को पहचाना नहीं है
    बात है छोटी मगर सबने इसे माना नहीं है
    बौ्ने किरदारों को अक्सर होता है क़द का गुमां
    क़द किसी का नापने का भीड़ पैमाना नहीं है
    हम तो बस उस आदमी के साथ चलना चाहते हैं
    जो अकेले में कभी ना, आईने से मुँह
    वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए
    साथ सब ना चल सकेंगे…

    आवरण भाने लगे तो सादगी का अर्थ भूले
    अर्थ की चाहत में पल-पल ज़िन्दगी का अर्थ भूले
    छोटी खुशियाँ द्वार पर दस्तकें तो लाईं लेकिन
    हम बड़ी खुशियाँ में छोटी हर खुशी का अर्थ भूले
    दूसरों की खुशियाँ में जो ढ़ूढ़कर अपनी खुशी को
    भोली-सी मुसकान हरदम अपने होठों पर सजाए
    वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए
    साथ सब ना चल सकेंगे…

    हर किसी को ये भरम है, साथ दुनिया का मेला
    पर हक़ीक़त में सभी को होना है इक दिन अकेला
    ज़िन्दगी ने मुस्कुराकर बस गले उसको लगाया
    जिसने भी ज़िदादिली से ज़िंदगी का खेल खेला
    दुनिया में उसका सभी मौसम सुहाने लगते हैं
    मौत की खिलती कली पर, भँवरा बन जो गुनगुनाये
    वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए
    साथ सब ना चल सकेंगे…

  • तुम अधूरी बात सुनकर चल दिए-

    जो सुना तुमने अभी तक, अनसुना इससे अधिक है
    जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है

    मैं तुम्हारी और अपनी ही कहानी लिख रहा था
    वक़्त ने जो की थी मुझपे मेहरबानी लिख रहा था
    पत्र मेरा अन्त तक पढ़ते तो ये मालूम होता
    मैं तुम्हारे नाम अपनी ज़िन्दगानी लिख रहा था
    तुम अधूरा पत्र पढ़कर चल दिए-

    जो पढ़ा तुमने अभी तक, अनपढ़ा इससे अधिक है
    जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है

    प्रार्थना में लग रहा कोई कमी फिर भी रह गई है
    हंस रहा हूं किन्तु पलकों पर नमी फिर रह गई है
    फिर तुम्हारी ही क़सम ने इस क़दर बेबस किया
    ज़िन्दगी हैरान मुझको देखती फिर रह गई है
    भाग्य-रेखाओं में मेरी आज तक-

    जो लिखा तुमने अभी तक, अनलिखा इससे अधिक है
    जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है

    हो ग़मों की भीड़ फिर भी मुस्कु्राऊँ, सोचता हूं
    मैं किसी को भूलकर भी याद आऊँ, सोचता हूं
    कोई मुझको आँसुअओं कि तरह पलकों पर सजाये
    ओर करे कोई इशारा, टूट जाऊँ सोचता हूं
    ज़िन्दगी मुझसे मिली कहने लगी-

    जो गुना तुमने अभी तक, अनगुना इससे अधिक है
    जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है

    यूं तो शिखरों से बड़ी ऊँचाईयों को छू लिया है
    छूने को पाताल-सी गहराईयों को छू लिया है
    विष भरी बातें हंसी जब बींध कर मेरे ह्रदय को
    खुश्बुएँ छूकर लगा अच्छाईयों को छू लिया है
    तुम मिले जिस पल मुझे ऐसा लगा-

    हो छुआ मैंने अभी तक, अनछुआ इससे अधिक है
    जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है

    तुम अधूरी बात सुनकर चल दिए…

  • तुम्हारे शहर से जाने का मन है
    यहाँ कोई भी तो अपना नहीं है

    महक थी अपनी साँसों में,परों में हौसला भी था
    तुम्हारे शहर में आये तो हम कुछ ख्वाब लाये थे
    जमीं पर दूर तक बिखरे – जले पंखो ! तुम्हीं बोलो
    मिलाकर इत्र में भी मित्र कुछ तेजाब ले आये

    बड़ा दिल रखते हैं लेकिन हकीकत सिर्फ है इतनी
    दिखाने के लिए ही बस ये हर रिश्ता निभाते हैं
    कि जब तक काम कोई भी न हो इनको किसी से तो
    न मिलने को बुलाते हैं, न मिलने खुद ही आते हैं

    बहुत नजदीक जाकर देखने से जान पाये हम
    कोई चेहरे नहीं हैं ये मुखौटे ही मुखौटे हैं
    हमेशा ही बड़ी बातें तो करते रहते हैं हरदम
    पर इनकी सोच के भी कद इन्हीं के कद से छोटे हैं

    कभी लगता है सारे लोग बाजीगर नहीं तो क्या
    मजे की बात है हमको करामाती समझते हैं
    हमेशा दूसरों के दिल से यूँ ही खेलने वाले
    बड़ा सबसे जहां में खुद को जज्बाती समझते हैं

    शिकायत हमसे करते हैं कि दुनिया की तरह हमको
    समझदारी नहीं आती, वफादारी नहीं आती
    हमें कुछ भी नही आता, मगर इतना तो आता है
    जमाने की तरह हमको अदाकारी नहीं आती

    न जाने शहर है कैसा, न जाने लोग हैं कैसे
    किसी की चुप्पियों को भी ये कमजोरी समझते हैं
    बहुत बचकर, बहुत बचकर, बहुत बचकर चलो तो भी
    बिना मतलब, बिना मतलब, बिना मतलब उलझते हैं

    शहर की इन फ़िजाओं में अजब-सी बात ये देखी
    खुला परिवेश है फिर भि घुटन महसूस होती है
    यहाँ अनचाहे- अनजाने से रिश्ते हैं बहुत लेकिन
    हर इक रिश्ते की आहट में चुभन महसूस होती है

    बहुत मजबूर होकर हम अगर कोशिश करें तो भी
    तुम्हारे शहर में औरों के जैसे हो नहीं सकते
    बिछाता है कोई काँटे अगर राहों में तो भी हम
    किसी की राह में काँटे कभी भी बो नहीं सकते

    मिलेंगे अब कहाँ अपने, जगेंगे क्या नए सपने
    बुझेगी अब कहाँ पर तिश्नगी ये किसलिए सोचें
    चलो खुद सौंप आएँ जिन्दगी के हाथ में खुद को
    कहाँ ले जाएगी फिर जिंदगी ये किसलिए सोचें

    नये रस्ते, नये हमदम, नई मंजिल, नई दुनिया
    भले हो इम्तिहां कितने, कोई अब गम नहीं होंगे
    सफ़र यूँ जिन्दगी का रोज कम होता रहे तो भी
    सफ़र जिन्दादिली का उम्रभर अब कम नहीं होगा

    यहाँ नफ़रत के दरिया हैं, यहाँ जहरीले बादल हैं
    यहाँ हम प्यार की एक बूँ द तक को भी तरसते हैं
    यहाँ से दूर, थोड़ी दूर, थोड़ी दूर जाने दो
    यहाँ हर कूचे में दीवानों पे पत्थर बरसते हैं

    ऐ मेरे दोस्त ! तुम मरहम लिए बैठे रहो लेकिन
    जमाना जख्म भरने की इजाजत भी नहीं देगा
    हमें फ़ितरत पता है इस शहर की, ये शरीफ़ों को
    न जीने चैन से देगा, न मरने चैन से देगा

    अगर अपना समझते हो तो मुझसे कुछ भी मत पूछो
    समाया है अभी दिल में गहन सागर का सन्नाटा
    किसी से कहना भी चाहें तो हम कुछ कह नहीं सकते
    हमें खामोश रखता है बहुत अन्दर का सन्नाटा

    किसी को फ़र्क क्या पड़ता है जो हम खुद में तन्हा हैं
    किसी दिन शाख से पत्ते की तरह टूट भी जाएँ
    किसी से भी कभी ये सोच करके हम नहीं रूठे
    मनाने कौन आएगा, अगर हम रूठ भी जाएँ

    तुम्हारे शहर के ये लोग, तुम इनको बताना तो
    भला औरों के क्या होंगे ये खुद अपने नहीं हैं
    मुसलसल पत्थरों में रहके पत्थर बन गए सब
    किसी की आँख में भी प्यार के सपने नहीं हैं

    मुझे मालूम है ऐ दोस्त ! तुम ऐसे नहीं हो, पर
    तुम्हारा दिल दुखाकर मैं भला खुश कब रहूँगा
    मगर अब सर से ऊँचा उठ रहा है रोज पानी
    मैं अपने दिलपे पत्थर रखके बस तुमसे कहूँगा

  • Listen this geet Listen

    इक लड़की भोली-भाली सी
    महके फूलों की डोली – सी
    निश्छल, निर्मल, चंचल धारा
    जैसे तोड़ के चले किनारा
    नेह के अमरित कलश से मेरी
    जीवन बगिया को सींचे
    जिसके पीछे दुनिया पागल
    वो पागल मेरे पीछे…

    वो दुनिया का गणित न जाने
    सबकी बातें सच्ची माने
    जागी आँखों में कुछ सपने
    उसको सब लगते हैं अपने
    झील-सी गहरी आँखें सुहानी
    जैसे कहें अनकही कहानी
    मौन निमन्त्रण मुझको जिसका
    कोई अर्थ स्वयं गढ़ लूँ
    उसकी चाहत बस मैं उसकी
    आँखों में चेहरा पढ़ लूँ
    उससे कुछ कहना चाहूँ तो
    हँसकर अँखियों को मींचे
    जिसके पीछे दुनिया पागल
    वो पागल मेरे पीछे…

    उसका जीवन खुली हथेली
    वो क्या जाने प्यार पहेली
    वेद ॠचाओं-सी वो पावन
    उससे महके प्रीत का चंदन
    सारा खालीपन भर देगी
    जीवन वृंदावन कर देगी
    देह-सृष्टि ऐसी कि जैसे
    लाखों वंदनवार सजे
    उसकी मादक छुवन से पल में
    मन – वीणा के तार बजे
    इक अनदेखे-से बंधन में
    मुझको अपनी ओर खींचे,
    जिसके पीछे दुनिया पागल
    वो पागल मेरे पीछे…

    आँचल में खुश्बू भर लाई
    उससे महक उठी अँगनाई
    मौसम की पहली बारिश वो
    अब मेरी भी हर ख्वाहिश वो
    डरता हूँ कुछ कर ना जाये
    ना बोलूँ तो मर ना जाये
    सोच रहा हूँ आखिर कैसे
    अब मैं उसको समझाऊँ
    उसको समझाते –समझाते
    खुद पागल ना हो जाऊँ
    मन करता है रख दूँ दिल को
    उसकी पलकों के नीचे
    जिसके पीछे दुनिया पागल
    वो पागल मेरे पीछे…

  • Listen this geet Listen

    है वही घर, वो ही चीज़ें
    वो ही शब, वो ही सहर
    है नहीं तो बस वो नहीं
    जिससे घर लगता था घर

    हमसे ये दीवार, आँगन कोई बोलेगा नहीं
    चाँद-सा चेहरा कभी अब द्वार खोलेगा नहीं
    मेघ जब बरसा करेंगे
    हम बहुत तरसा करेंगे
    अब तो हर इक मोड़ पर
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    जब दु;खों की धूप थी तो कुछ नहीं था हाथ में
    अब सुखों की छाँव है तो तुम नहीं हो साथ में
    हो गए हम कितने रीते
    बिन तुम्हारे कैसे बीते
    अब ये जीवन का सफ़र
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    अब जिएँगे उम्र भर हम दर्द की परछाईं में
    हँस तो लेंगे साथ सबके, रोएँगे तनहाई में
    लोग तो सब जान लेंगे
    दर्द को पहचान लेंगे
    तुम रहोगे बेखबर
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    ख्वाब आँखों में सँजोकर काश हम सोते नहीं
    जिन्दगी तेरी कसम तुझको यूँ खोते नहीं
    अब तो बस आहें भरेंगे
    और तुझे ढूँढा करेंगे
    तारों में हम रात भर
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    कोई कहने को सफ़र यूँ अपना पूरा कर चला
    पर किसी को उम्र भर को, वो अधूरा कर चला
    कौन सी दुनिया है आख़िर
    जिस तरफ़ जामर मुसाफ़िर
    आते कब हैं लौटकर
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    या तो तुम आते नहीं यूँ मेरे घर-संसार में
    या कि फिर जाते नहीं यूँ छोड़कर मँझधार में
    अब न आहों में असर है
    और कठिन कितना सफ़र है
    उसपे तनहा रहगुज़र
    है नहीं तो बस वो नहीं…

    हम सहेजे ही रहेंगे हर निशानी उम्र भर
    साथ में चलती रहेगी इक कहानी उम्र भर
    तुम कहीं पर भी रहोगे
    पर सदा मेरी सुनोगे
    सुन रहे हो हमसफ़र !
    है नहीं तो बस वो नहीं…

  • तुमसे मिलकर जीने की चाहत जागी
    प्यार तुम्हारा पाकर ख़द से प्यार हुआ

    तुम औरों से कब हो,तुमने पल भर में
    मन के सन्नाटों का मतलब जान लिया
    जितना मैं अब तक ख़द से अन्जान रहा
    तुमने वो सब पल भर में पहचान लिया

    मुझपर भी कोई अपना ह्क़ रखता है
    यह अहसास मुझे भी पहली बार हुआ
    प्यार तुम्हारा पाकर ख़द से प्यार हुआ

    ऐसा नहीं कि सपन नहीं थे आँखों में
    लेकिन वो जगने से पहले मुरझाए
    अब तक कितने ही सम्बन्ध जिए मैंने
    लकिन वो सब मन को सींच नहीं पाये

    भाग्य जगा है मेरी हर प्यास क
    तप्ति के हाथों ही खुद सतकार हुआ
    प्यार तुम्हारा पाकर ख़द से प्यार हुआ

    दिल कहता है तुम पर आकर ठहर गई
    मेरी हर मजबूरी, मेरी हर भटकन
    दिल के तारों को झंकार मिली तुमसे
    गीत तुम्हारे गाती है दिल की धड़कन

    जिस दिल पर अधिकार कभी मैं रखता था
    उस दिल क हाथों ही अब लाचार हुआ
    प्यार तुम्हारा पाकर खुद से प्यार हुआ

    बहकी हुई हवाओं ने मेरे पथ पर
    दूर-दूर तक चंदन-गंध बिखेरी है
    भाग्य देव ने स्वयं उतरकर धरती पर
    मेरे हाथ में रेखा नई उकेरी है

    मेरी हर इक रात महकती है अब तो
    मेरा हर दिन जैसे इक त्यौहार हुआ
    प्यार तुम्हारा पाकर खुद से प्यार हुआ

  • Listen this geet Listen

    मछलियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    ढ़ेर- सा है जल, तो तड़पन भी बहुत हैं

    शाप है य कोई वरदान है
    यह समझ पाना कहाँ आसान है
    एक पल ढ़ेरों ख़ुशी ले आएगा
    एक पल में ज़िन्दगी वीरान है
    लड़कियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    पर हैं उड़ने को, तो बंधन भी बहुत हैं…

    भोली-भाली मुस्कुराहट अब कहाँ
    वे रुपहली-सी सजावट अब कहाँ
    साँकलें दरवाजों से कहने लगीं
    जानी- पहचानी वो आहत अब कहाँ
    चुड़ियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    हैं खनकते सुख, तो टूटन भी बहुत हैं…

    दिन तो पहले भी थे कुछ प्रतिकूल से
    शूल पहले भी थे लिपटे फूल से
    किसलिए फिर दूरियाँ बढ़ने लगीं
    क्यूँ नहीं आतीं इधर अब भूल से
    तितलियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    हैं महकते पल, तो अड़चन भी बहुत हैं…

    रास्ता रोका घने विशवास ने
    अपनेपन कि चाह ने, अहसास ने
    किसलिए फिर बरसे बिन जाने लगी
    बदलियों से जब ये पुछा प्यास ने
    बदलियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    हैं अगर सावन तो भटकन भी बहुत हैं…

    भावना के अर्थ तक बदले गए
    वेदना के अर्थ तक बदले गए
    कितना कुछ बदला गया इस शोर में
    प्रार्थना के अर्थ तक बदले गए
    चुप्पियाँ बोलीं-
    हमारे भाग्य में
    कहने का है मन, तो उलझन भी बहुत हैं…

  • Listen this geet Listen

    पहले मन में पीड़ा जागी
    फिर भाव जगे मन-आँगन में
    जब आँगन छोटा लगा उसे
    कुछ ऐसे सँवर गई पीड़ा
    क़ागज़ पर उतर गई पीड़ा…

    जाने-पहचाने चेहरों ने
    जब बिना दोष उजियारों का
    रिश्ता अँधियारों से जोड़ा
    जब क़समें खानेवालों ने
    अपना बतलाने वालों ने
    दिल क दरपन पल-पल तोड़ा

    टूटे दिल को समझाने को
    मुश्किल में साथ निभाने को
    छोड़ के सारे ज़माने को
    हर हद से गुज़र गई पीड़ा…

    ये चाँद सितारे और अम्बर
    पहले अपने-से लगे मगर
    फिर धीरे-धीरे पहचाने
    ये धन-वैभव, ये किर्ति-शिखर
    पहले अपने- से लगे मगर
    फिर ये भी निकले बेगाने

    फिर मन का सूनापन हरने
    और सारा ख़ालीपन भरने
    ममतामयी आँचल को लेकर
    अन्तस में ठहर गई पीड़ा
    काग़ज़ पर उतर गई पीड़ा…

    कुछ ख़्वाब पले जब आँखों में
    बेगानों तक का प्यार मिला
    यूँ लगा कि ये संसार मिला
    जब आँसूं छ्लके आँखों से
    अपनों तक से प्रतिकार मिला
    चुप रहने का अधिकार मिला

    फिर ख़ुद में इक विशवास मिला
    कुछ होने का अहसास मिला
    फिर एक खुला आकाश मिला
    तारों-सी बिखर गई पीड़ा
    काग़ज़ पर उतर गई पीड़ा…